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भूख और गरीबी के आईने में खुद को निहारता 'मैग्निफिसेंट' मध्यप्रदेश

विकास सिंह
मध्यप्रदेश में हनीट्रैप के शोरगुल के बीच समाज को आईना दिखाने वाली 2 खबरें गुम सी हो गईं। पिछले दिनों प्रदेश की सियासत में सागर और बड़वानी से 2 खबरें आईं, जिसने हमारे आज के समाज को आइना दिखा दिया। सूबे के आदिवासी बहुल इलाके बड़वानी में भूख के चलते एक 8 साल के मासूम की मौत हो गई।

गरीबी के चलते पूरे परिवार को पिछले कई दिनों से जब खाने को अनाज नहीं मिला तो परिवार बीमार पड़ गया और अस्पताल में इलाज के दौरान परिवार के 8 साल के मासूम बच्चे की मौत हो गई। ठीक इसी समय सागर के रहली में गरीबी से परेशान जब एक परिवार कई दिनों से भूखा रह रहा था तो भूख से तड़पते अपने भाइयों के खाने का इंतजाम करने के लिए 12 साल की एक मासूम बच्ची ने मंदिर की दान पेटी से 250 रुपए चुरा लिए।

इंसानियत और सभ्य समाज को झकझोरकर रख देने वाली यह दोनों खबरें हनीट्रैप और भारत और पाकिस्तान के उन्माद में न तो न्यूज चैनलों की हैडलाइन बन पाईं और न ही अखबारों की पहले पन्ने की सुर्खियां, लेकिन इन दोनों खबरों ने हमारे समाज और सिस्टम पर ऐसी चोट पहुंचाई कि हर कोई अंदर से हिल गया।
5 साल में 95 हजार नवजात बच्चों की मौत : कहते हैं कि किसी भी समाज को देखना हो तो पहले उसके बच्चों की सूरत को देखिए। समाज के सबसे गरीब और वंचित घरों के बच्चों को देखिए वहां देखकर आप समझ पाएंगे कि उस समाज का भविष्य क्या है। बड़वानी और सागर की घटना में आप समझ ही गए होंगे कि मध्यप्रदेश के बच्चों की सूरत क्या होगी, लेकिन सरकार के ही आंकड़े जिस तस्वीर को दिखाते हैं, वह अति भयावह है।

मध्यप्रदेश में पिछले 5 सालों में लगभग 95 हजार (94,699) सिर्फ नवजात बच्चों ने गरीबी और कुपोषण के चलते दम तोड़ दिया है। यह उन बच्चों की संख्या है जो अपना पहला जन्मदिन भी नहीं मना पाए। बच्चों की मौत का ये आंकड़ा उस दौर का है जब मध्यप्रदेश को स्वर्णिम प्रदेश बनाने का दावा हर मंच से किया जा रहा था।

आंकड़ों के नजरिए से देखें तो प्रदेश में नवजात बच्चों की मौत का आंकड़ा 5 साल में 4 गुना बढ़ गया। अगर बात करें तो 2013-14 में 7875, 2014-15 में 14109, 2015-16 में 23152, 2016-17 में 22003 और 2018-19 में 27560 नवजात बच्चे मौत का शिकार बन गए। यह एक ऐसा आंकड़ा है जो किसी भी सभ्य समाज और अपने को जनहितैषी सरकार बताने वाले सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है। मध्यप्रदेश नवजात शिशु मृत्यु में एक बार फिर पूरे देश में टॉप पर आ गया है। प्रदेश में एक हजार जीवित शिशु जन्म पर 47 शिशुओं की मौत हो रही है।

5 साल में साढ़े 9 लाख बच्चे कुपोषण का शिकार : मध्यप्रदेश में नवजात बच्चों की मौत का आंकड़ा आने वाले समय में और भी बढ़ सकता है। इसका सबसे बड़ा कारण पिछले 5 सालों में तकरीबन साढ़े 9 लाख बच्चे जन्म से ही कुपोषण का शिकार रहे हैं। मध्यप्रदेश में गरीबी और सरकार की योजनाओं का जमीनी स्तर पर सही तरीके क्रियान्वयन नहीं होने से 100 में से 42 बच्चे कुपोषण का शिकार हो रहे हैं।

गरीबी के कारण मौत : मध्यप्रदेश के माथे पर लगे कुपोषण के कलंक को मिटाने के लिए सरकारी स्तर पर पिछले 15 सालों में योजनाओं का खूब निर्माण हुआ, बहुत सी योजनाएं भी चलाई गईं, लेकिन इनका असर जमीनी स्तर पर कहीं भी नजर नहीं आ रहा है। इंदिरा गांधी से लेकर मोदी सरकार तक ने देश में गरीबी हटाओ का नारा दिया, लेकिन आंकड़े बताते हैं कि यह नारा सिर्फ नारा ही बनकर रह गया।

आक्सफेस की रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2017-18 में देश के अरबपतियों ने 20,913 अरब रुपए कमाए जो कि भारत सरकार के बजट के बराबर है। भारत में ऊंचे ओहदे पर तैनात अधिकारी को 8600 रुपए प्रतिदिन के मान से वेतन मिलता है, लेकिन गरीबों यानी मजूदरी करने वालों की आय का सबसे बड़ा साधन मनरेगा के तहत भारत में औसत मजदूरी 187 रुपए तय है। क्रेडिट स्युइज की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत के सबसे गरीब 20 फीसदी लोगों के पास कोई संपत्ति ही नहीं है।

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